मेरे पापा
मैं और मेरे पापा हर ख्वाब में पापा का सर गर्व से ऊचा करने की चाह पर क्या ऐसा हो पाया बचपन में न गोद में खिलाया और न प्यार से सहलाया पापा की तीखी नजरो ने मुझे हर पल है डराया पापा के आते ही ख़ुशी का एक पल भी नजर न आया। बस कुछ ऐसी ही मेरी और मेरे पापा की कहानी----------------

वैसे तो पापा हर बेटी के जीवन का आधार होते है पर मेरे पापा बचपन से एक डर था कही पापा को ये बात या ऐसी शरारत बुरी न लग जाए न कभी उन्होंने मुझे प्यार से गले लगाया और न कभी पढ़ाया। दिन और रात एक जैसे लगते थे एकदम सुने और न कही हसी का एक पल कुछ ऐसे ही बीता मेरा बचपन दुसरो के पाप बेटी के बालो को सवारते है पर मेरे पापा मेरे बालो को खुला देखकर काट दिया।
ऐसा ही एक दिन था जब वो सब मुझे बंद अँधेरे घर में छोड़ कर चले गए। उस नन्ही सी गुड़िया का क्या कसूर , सीख गयी अंधेरो में रहना खिड़कियों और दरवाजों से बाते करना , सीख गयी जमीन पर खाना खाना , सीख गयी अकेले रहना। पर किसी से कोई शिकायत नहीं थी। याद है मुझे वो दिन जब पापा ने मुझे छोटी सी गलती पर बहुत मारा था की अब तो पापा के नाम से ही डर लगने लगा हर पल यही डर था की कही कुछ हो न जाए ,
ऐसी ही वो घडी थी जब पापा ने मुझे अपनी बेटी कहने से नकारा।
उस दिन दिल से आवाज आई क्या ऐसे ही होते है पापा
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