पत्र
प्यारी गर्मी
मैं तुम्हारी दोस्त बरसात तुम भूल गई क्या, जब भी तुम्हारा गुस्सा बरपाता है तो मैं ही आती हूँ, तुम्हे शांत करने के लिए, अरे भई, इतना भी गुस्सा क्यों ! लगता है, तुम्हे अपने आप पर बड़ा नाज है और हो भी क्यों न इतनी शक्तिशाली जो ठहरी ! जाड़े के दिनों में तो, तुम लोगो को बड़ा याद आती हो लोग थोड़ी सी गर्माहट पाने के लिए तरसते है और इन दिनों तुम इन्हें कितना परेशान कर देती हो ! की लोगो को बिन नहाये ही नहाने का एहसास दिला देती हो मेरा मतलब, लोग पसीने से ही हरवक्त नहाये रहते है ! तुम्हारे कहर से धरती का पानी सूख रहा है यह तक की जानवर और पेड़ पौधे भी पानी के लिए तरस रहे है ! अरे भई इतना गुस्सा मत किया करो, कभी अपनी जुल्फों पर काली घटा छाने दिया करो , सूरज की हलकी लालिमा वाली बिंदी माथे पर लगाया करो , गले में फूलो से लदे पेड़ पौधे सजाया करो ,और सर पर इन्द्रधनुष का ताज और ठंडी हवाओ का चादर तभी तो लगोगी एकदम सुन्दर !मुझे पता है की तुम मेरी बात न मानोगी, बड़ी हठी जो ठहरी !
आशा करती हूँ, की तुम मुझसे जल्दी मिलने आओगी !
तुम्हारी दोस्त बरसात










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